Thursday, September 11, 2008

बिहार में बाढ़ - हर साल एक ही मंजर


70 साल के बूढे जोगेंदर ने सामान तो मचान पर चढा दिया है, लेकिन गेहूं-मकई नहीं चढा पाये। अकेले हैं। दोनों बेटे बहुओं-बच्चों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने गये हैं। खैनी ठोंकते हुए वे हंसते हैं- उदास हंसी-“ यही तेजी रही तो कल तक सडक पार कर जायेगा पानी.” 65-70 साल की जिदंगी में पहली बार देखा है अपने घर में पानी भरते हुए. घर गया. अनाज गया. उनके खेत उन्हें खाने लायक अनाज दे देते हैं- गेहूं, धान, मकई. इस बार सब खत्म. खेत में खडी धान की फसल को बाढ लील गयी, घर में रखा अनाज पानी में डूब गया.... लोग जुट आये हैं. वे सुनाते हैं- “ सौ साल पहले यहां कोसी बहती थी. अब लगता है, वह फिर लौट आयी है.” बेचन यादव, कारी, तेजनारायण, रामदेव, संजय व शैलेंद्र ... दर्जनों लोग, सबके पास कई-कई कहानियां. किसी के आंगन में पोरसा भर पानी है, तो किसी के घर में सांप घुस आया है. अभी लेकिन सब शांत हैं-चिंता की एक रेख तक नहीं है. कहते हैं- अभी सड़क तो है ही सोने के लिए. ज्यादा डूबने लगेगा तो प्लान करेंगे निकलने का....लेकिन बूढे जोगेंदर को यह भी चिंता नहीं. वे अपनी खैनी होठों के नीचे दाब चुके हैं-“ हम अकेले आदमी, मर जायेंगे तो क्या होगा ? सांप भी कांट लेगा, तो क्या होगा ?
---------------------------------------------------------{ ये है बाढ़ की बिभिशिका को झेल रहे आम आदमी की दास्ताँ॥ यह जो बिहार में इस बार हुआ है वो कोई नई चीज नही है ॥ इसी तरह हर साल तबाही होती है और सबसे बड़ी बिडम्बना यह है की लगभग एक ही क्षेत्र की जनता इसका शिकार होती है फ़िर भी सरकार मूक साबित होती है ।
इस बार की घटना को यदि किनारे कर भुत की ओर देखें पे पता चलता है की वहां के लोगों के लिए " आ बैल मुझे मार " वाली मुहावरा चरितार्थ होती है। जनता ही नही सरकार भी भिज्ञ होती है की इस इलाके के लोगों को बाढ़ से तबाही होने वाली है , लेकिन वो पहले से उनके लिए कुछ नही करती बल्कि तबाही होने का इंतजार करती है [:( ] । हर जगह वोट बैंक की राजनीती होती है चाहे वो भय और भूख से झुझ रही आम जनता हो या फ़िर नौकरशाहों की पीठ पोछने की बात हो !