Saturday, March 29, 2008

ख़ुद से संघर्ष !!!!

आँखें खुली है ,
अपलक देखता हूँ
कोई देखे तो सोचे
कही नज़र टिकी हुई है,
लेकिन अफ़सोस मुझे कुछ दिखता ही नही

ध्यान केंद्रित है -
एक साथ बहुत कुछ सोचता हूँ लेकिन
किसी सोच को अंजाम दे पता नही
कारण किसी एक चीज पर ज्यादा सोचने का जी करता नही !!!!
arvind

( THIS IS THE REASON ,INSPITE OF HAVING DEEP INTERSEST\LOVE WITH HINDI MY MANY POEMS ARE STILL EXISTING IN DIARY ONLY..

Friday, March 28, 2008

शिकायत ख़ुद से और सबसे !!!

















कहाँ गया वो बगीचा ???
वो शीशम के पेड़ , वो आम की डालियाँ ।
वो काहुए और चीर , लीची की क्यारियाँ ।

कहाँ गया वो शाम ?
जब दिखता था बगुलों का झुंड , सुनाई देता था पक्षियों का कलरव स्वर,
कोयल की कुक और भन- भन करता भ्रमर ।

अब बाँध पर से निगाहें दौड़ता हूँ तो ,
सब कुछ सुना दिखता है !
आसमान सुना है , हवाएं सुनी है ।
एक्के -दुक्के पेड़ है वो भी सुने है ।
हो भी क्यूँ नही ,
क्यूँ अब दिखेगा आसमान में उड़ते तोते का झुंड ?
जिस ज़मीन पर कभी पानी होता था ,वहां अभी दरारें है ।
तो फ़िर क्या करने आएगा बगुला ?
घोसला बनने के लिए पेड़ नही तो कहाँ रहेगा चिल और बाज ???

सुना है पिछले महीने बगीचा बेच दीया गया । -------
शहर से आए थे कुछ लोग ,
ट्रक्टर की टोलियों पर पेड़ लादकर ले गए ।
किसी ने उनसे पूछा तो बताया इससे बनेंगे महलों के साजो -सामान,
रहेसों के सुख सुविधाओं का सामान ।

कितना आसन हो गया है निर्दोषों और कमजोरों के अस्तित्वा से खिलवार करना !!!!
किसी के जिंदगी को टाक पर रखकर,
ख़ुद को ऐशो -आराम की जिंदगी देना ।
पर विडम्बना तो देखो बुध्हिमान कहलाने वाला यह प्राणी
क्या ख़ुद के अस्तित्वा को टाक पर नही रख रहा ????
~~~~~~~ end~~~~~~~~