आज मेरे एक मित्र ने मुझे डायरी से बाहर कुछ लिखने को कहा , बहुत दिन हो गया था और मैंने भी सोचा ब्लॉग पे ही क्यूँ नहीं ॥ मूड भी था और कीबोर्ड जुबाँ के लफ्जों को अपने में समाने को धक्के देने लगी..
दोस्त ने कहा , तुम छा गए .......
मेरा जबाब कुछ ऐसा था ,
छाना या न छाना तो तब पता चलता है,
जब कोई दिन के उजाले में निकले ।
हम तो रात के अँधेरे में निकला करते है,
और वो भी माहताब से छुपकर।
अब तो कहने को सिर्फ यही है ...
खो जाने दे मुझे, सो जाने दे मुझे,
भूक-भूक कर जलने से क्या हासिल !!!
बुझ जाने दे मुझे !!!!!!!!!!!! क्यूंकि....
गरीबों की जबानी नहीं होती ,
बिधवाओं का सौंदर्य नहीं होता।
उग्रवाद का कोई धर्मं नहीं होता,
बंदी योद्धा में जोश नहीं होता।
इसपे उसका जबाब था...
लेकिन सहारा देने पर , सबको सब कुछ मिल सकता है,
क्यूंकि डूबते को सिर्फ तिनके का सहारा चाहिए होता है।
उसका कहना सही था, अब मेरा कटाक्ष ....
विलाशी युवराज को ताजोपोश नसीब नहीं होता,
आलसी लोग कभी सफल नहीं होता,
सिर्फ भगवान से मांगने से , कुछ नहीं होता !
इसपे वो गौण रह गया....
मैं कहता हूँ , भले नहीं होता ,
यदि इन्हे होता भी तो, क्या होता !!!!!!!
Monday, November 28, 2011
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