कहाँ गया वो बगीचा ???
वो शीशम के पेड़ , वो आम की डालियाँ ।
वो काहुए और चीर , लीची की क्यारियाँ ।
कहाँ गया वो शाम ?
जब दिखता था बगुलों का झुंड , सुनाई देता था पक्षियों का कलरव स्वर,
कोयल की कुक और भन- भन करता भ्रमर ।
अब बाँध पर से निगाहें दौड़ता हूँ तो ,
सब कुछ सुना दिखता है !
आसमान सुना है , हवाएं सुनी है ।
एक्के -दुक्के पेड़ है वो भी सुने है ।
हो भी क्यूँ नही ,
क्यूँ अब दिखेगा आसमान में उड़ते तोते का झुंड ?
जिस ज़मीन पर कभी पानी होता था ,वहां अभी दरारें है ।
तो फ़िर क्या करने आएगा बगुला ?
घोसला बनने के लिए पेड़ नही तो कहाँ रहेगा चिल और बाज ???
सुना है पिछले महीने बगीचा बेच दीया गया । -------
शहर से आए थे कुछ लोग ,
ट्रक्टर की टोलियों पर पेड़ लादकर ले गए ।
किसी ने उनसे पूछा तो बताया इससे बनेंगे महलों के साजो -सामान,
रहेसों के सुख सुविधाओं का सामान ।
कितना आसन हो गया है निर्दोषों और कमजोरों के अस्तित्वा से खिलवार करना !!!!
किसी के जिंदगी को टाक पर रखकर,
ख़ुद को ऐशो -आराम की जिंदगी देना ।
पर विडम्बना तो देखो बुध्हिमान कहलाने वाला यह प्राणी
क्या ख़ुद के अस्तित्वा को टाक पर नही रख रहा ????
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